Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.8.32-33h: प्राचीन काल में जो राजा ऋषि थे और अब स्वर्ग में निवास करते हैं, उन्होंने भी राजा के कर्तव्य का उसी प्रकार वर्णन किया है, जिस प्रकार भरे हुए समुद्र से मेघों के रूप में जल उठकर सब दिशाओं में बरसता है। उसी प्रकार राजाओं के घरों से धन निकलकर पृथ्वी पर फैल जाता है। ॥32 1/2॥ | mahabharat अध्याय 12.8: अर्जुनका युधिष्ठिरके मतका निराकरण करते हुए उन्हें धनकी महत्ता बताना और राजधर्मके पालनके लिये जोर देते हुए यज्ञानुष्ठानके लिये प्रेरित करना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
राजर्षयोऽपि ते स्वर्ग्या धर्मो ह्येषां निरुच्यते।
यथैव पूर्णादुदधे: स्यन्दन्त्यापो दिशो दश॥ ३२॥
एवं राजकुलाद् वित्तं पृथिवीं प्रति तिष्ठति।
अनुवाद
प्राचीन काल में जो राजा ऋषि थे और अब स्वर्ग में निवास करते हैं, उन्होंने भी राजा के कर्तव्य का उसी प्रकार वर्णन किया है, जिस प्रकार भरे हुए समुद्र से मेघों के रूप में जल उठकर सब दिशाओं में बरसता है। उसी प्रकार राजाओं के घरों से धन निकलकर पृथ्वी पर फैल जाता है। ॥32 1/2॥
The kings who were sages in ancient times and who now reside in heaven have also explained the duty of a king in the same way as water rising from a full ocean in the form of clouds pours down in all directions. In the same way, wealth flows out from the houses of kings and spreads all over the earth. ॥ 32 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥