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mahabharat 12.8.28: देवताओं ने अपने जाति-बंधुओं के साथ विश्वासघात करके ही स्वर्ग के समस्त स्थानों पर अधिकार कर लिया है। देवतागण, जिनसे धन और राज्य चाहते हैं, उस जाति के साथ विश्वासघात करने के अतिरिक्त और क्या कर सकते हैं?॥28॥   |   mahabharat अध्याय 12.8: अर्जुनका युधिष्ठिरके मतका निराकरण करते हुए उन्हें धनकी महत्ता बताना और राजधर्मके पालनके लिये जोर देते हुए यज्ञानुष्ठानके लिये प्रेरित करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 8: अर्जुनका युधिष्ठिरके मतका निराकरण करते हुए उन्हें धनकी महत्ता बताना और राजधर्मके पालनके लिये जोर देते हुए यज्ञानुष्ठानके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.8.28 
द्रोहाद् देवैरवाप्तानि दिवि स्थानानि सर्वश:।
द्रोहात् किमन्यज्ज्ञातीनां गृद्धॺन्ते येन देवता:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
देवताओं ने अपने जाति-बंधुओं के साथ विश्वासघात करके ही स्वर्ग के समस्त स्थानों पर अधिकार कर लिया है। देवतागण, जिनसे धन और राज्य चाहते हैं, उस जाति के साथ विश्वासघात करने के अतिरिक्त और क्या कर सकते हैं?॥28॥
 
It is by betraying their caste brothers that the gods have gained control over all the places in heaven. What else can the gods do except betrayal of caste from whom they want wealth and kingdom?॥28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)