श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 8: अर्जुनका युधिष्ठिरके मतका निराकरण करते हुए उन्हें धनकी महत्ता बताना और राजधर्मके पालनके लिये जोर देते हुए यज्ञानुष्ठानके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.8.16 
अर्थेभ्यो हि विवृद्धेभ्य: सम्भृतेभ्यस्ततस्तत:।
क्रिया: सर्वा: प्रवर्तन्ते पर्वतेभ्य इवापगा:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
जैसे पर्वतों से अनेक नदियाँ निकलती हैं, उसी प्रकार बढ़े हुए धन से सभी प्रकार के शुभ कर्म संपन्न होते हैं ॥16॥
 
Just as many rivers flow from the mountains, similarly with the increased wealth one accumulates all kinds of auspicious deeds are performed. ॥ 16॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd