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mahabharat 12.8.15: राजा ! जैसे पतित मनुष्य दयनीय होता है, वैसे ही दरिद्र मनुष्य भी दयनीय होता है; मैं पतित और दरिद्र में कोई भेद नहीं देखता ॥15॥   |   mahabharat अध्याय 12.8: अर्जुनका युधिष्ठिरके मतका निराकरण करते हुए उन्हें धनकी महत्ता बताना और राजधर्मके पालनके लिये जोर देते हुए यज्ञानुष्ठानके लिये प्रेरित करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 8: अर्जुनका युधिष्ठिरके मतका निराकरण करते हुए उन्हें धनकी महत्ता बताना और राजधर्मके पालनके लिये जोर देते हुए यज्ञानुष्ठानके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.8.15 
पतित: शोच्यते राजन् निर्धनश्चापि शोच्यते।
विशेषं नाधिगच्छामि पतितस्याधनस्य च॥ १५॥
 
 
अनुवाद
राजा ! जैसे पतित मनुष्य दयनीय होता है, वैसे ही दरिद्र मनुष्य भी दयनीय होता है; मैं पतित और दरिद्र में कोई भेद नहीं देखता ॥15॥
 
King! Just as a fallen man is pitiable, so is a poor man; I do not see any difference between a fallen man and a poor man. ॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)