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mahabharat 12.8.14: यदि कोई दरिद्र पास में खड़ा हो तो लोग उसे पापी या कलंकित समझते हैं; इसलिए इस संसार में दरिद्रता पाप है। मेरे सामने उसकी प्रशंसा मत करो ॥14॥   |   mahabharat अध्याय 12.8: अर्जुनका युधिष्ठिरके मतका निराकरण करते हुए उन्हें धनकी महत्ता बताना और राजधर्मके पालनके लिये जोर देते हुए यज्ञानुष्ठानके लिये प्रेरित करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 8: अर्जुनका युधिष्ठिरके मतका निराकरण करते हुए उन्हें धनकी महत्ता बताना और राजधर्मके पालनके लिये जोर देते हुए यज्ञानुष्ठानके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.8.14 
अभिशस्तं प्रपश्यन्ति दरिद्रं पार्श्वत: स्थितम्।
दरिद्रं पातकं लोके न तच्छंसितुमर्हति॥ १४॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई दरिद्र पास में खड़ा हो तो लोग उसे पापी या कलंकित समझते हैं; इसलिए इस संसार में दरिद्रता पाप है। मेरे सामने उसकी प्रशंसा मत करो ॥14॥
 
If a poor man is standing nearby people look at him as if he is a sinner or a disgraced person; hence poverty is a sin in this world. Do not praise him in front of me. ॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)