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mahabharat 12.8.11: राजा नहुष ने दरिद्रता में रहते हुए क्रूर कर्म किए थे और दुःखद भावना व्यक्त की थी कि 'इस संसार में दरिद्रता एक अभिशाप है! सब कुछ त्यागकर दरिद्र या दरिद्र हो जाना तो केवल ऋषियों का धर्म है, राजाओं का नहीं।'   |   mahabharat अध्याय 12.8: अर्जुनका युधिष्ठिरके मतका निराकरण करते हुए उन्हें धनकी महत्ता बताना और राजधर्मके पालनके लिये जोर देते हुए यज्ञानुष्ठानके लिये प्रेरित करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 8: अर्जुनका युधिष्ठिरके मतका निराकरण करते हुए उन्हें धनकी महत्ता बताना और राजधर्मके पालनके लिये जोर देते हुए यज्ञानुष्ठानके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.8.11 
आकिंचन्यं मुनीनां च इति वै नहुषोऽब्रवीत्।
कृत्वा नृशंसं ह्यधने धिगस्त्वधनतामिह॥ ११॥
 
 
अनुवाद
राजा नहुष ने दरिद्रता में रहते हुए क्रूर कर्म किए थे और दुःखद भावना व्यक्त की थी कि 'इस संसार में दरिद्रता एक अभिशाप है! सब कुछ त्यागकर दरिद्र या दरिद्र हो जाना तो केवल ऋषियों का धर्म है, राजाओं का नहीं।'
 
King Nahusha, while in poverty, had committed cruel acts and expressed the sad sentiment that 'Poverty is a curse in this world! Giving up everything and becoming poor or destitute is the religion of sages only, not of kings.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)