Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.8.1-2: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! युधिष्ठिर की यह बात सुनकर अर्जुन ऐसे असहिष्णु हो गए मानो उन पर कोई आरोप लगा दिया गया हो। बातचीत में या पराक्रम दिखाने में वे किसी से भी डरने वाले नहीं थे। उनका पराक्रम बड़ा भयानक था। महाबली इन्द्रकुमार अपना भयंकर रूप प्रकट करके और दोनों गाल चाटते हुए ऐसे गर्व से भरे हुए शब्द बोलने लगे मानो वे किसी नाटक के मंच पर अभिनय कर रहे हों।॥1-2॥ | mahabharat अध्याय 12.8: अर्जुनका युधिष्ठिरके मतका निराकरण करते हुए उन्हें धनकी महत्ता बताना और राजधर्मके पालनके लिये जोर देते हुए यज्ञानुष्ठानके लिये प्रेरित करना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! युधिष्ठिर की यह बात सुनकर अर्जुन ऐसे असहिष्णु हो गए मानो उन पर कोई आरोप लगा दिया गया हो। बातचीत में या पराक्रम दिखाने में वे किसी से भी डरने वाले नहीं थे। उनका पराक्रम बड़ा भयानक था। महाबली इन्द्रकुमार अपना भयंकर रूप प्रकट करके और दोनों गाल चाटते हुए ऐसे गर्व से भरे हुए शब्द बोलने लगे मानो वे किसी नाटक के मंच पर अभिनय कर रहे हों।॥1-2॥
Vaishampayana says- Janamejaya! On hearing this from Yudhishthira, Arjuna became so intolerant as if some accusation had been made against him. He was not to be cowed down by anyone in conversation or in displaying his prowess. His prowess was very terrifying. The mighty Indrakumara, while revealing his fierce form and licking both his cheeks, started smiling and speaking such proud words as if he was acting on the stage of a drama.॥1-2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥