श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 79: ऋत्विजोंके लक्षण, यज्ञ और दक्षिणाका महत्त्व तथा तपकी श्रेष्ठता  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.79.7 
युधिष्ठिर उवाच
यदिदं वेदवचनं दक्षिणासु विधीयते।
इदं देयमिदं देयं न क्वचिद् व्यवतिष्ठते॥ ७॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा - भरत! यज्ञों के सम्बन्ध में दी जाने वाली दक्षिणा (अर्पण) के सम्बन्ध में जो वैदिक कथन है कि 'यह भी देना चाहिए, यह भी देना चाहिए', वह किसी सीमित बात पर आधारित नहीं है।॥7॥
 
Yudhishthira asked - Bharata! The Vedic statement regarding dakshina (offerings) given in connection with sacrifices that 'this should also be given, this should also be given' is not based on any limited thing. ॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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