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mahabharat 12.79.3: जो एकमात्र यजमान के हित के लिए सदैव तत्पर रहते हैं, धैर्यवान, प्रेममय, एक-दूसरे के प्रति दयालु तथा सर्वत्र समदृष्टि रखते हैं, वे ही ऋत्विज होने के योग्य हैं ॥3॥   |   mahabharat अध्याय 12.79: ऋत्विजोंके लक्षण, यज्ञ और दक्षिणाका महत्त्व तथा तपकी श्रेष्ठता   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 79: ऋत्विजोंके लक्षण, यज्ञ और दक्षिणाका महत्त्व तथा तपकी श्रेष्ठता  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.79.3 
ये त्वेकरतयो नित्यं धीराश्च प्रियवादिन:।
परस्परस्य सुहृद: समन्तात् समदर्शिन:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
जो एकमात्र यजमान के हित के लिए सदैव तत्पर रहते हैं, धैर्यवान, प्रेममय, एक-दूसरे के प्रति दयालु तथा सर्वत्र समदृष्टि रखते हैं, वे ही ऋत्विज होने के योग्य हैं ॥3॥
 
Those who are always ready to serve the welfare of the only host, are patient, loving, kind to each other and have equal vision everywhere, only they are worthy of being Ritvija. 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)