| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 79: ऋत्विजोंके लक्षण, यज्ञ और दक्षिणाका महत्त्व तथा तपकी श्रेष्ठता » श्लोक 15 |
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| | | | श्लोक 12.79.15  | पुमान् यज्ञश्च सोमश्च न्यायवृत्तो यदा भवेत्।
अन्यायवृत्त: पुरुषो न परस्य न चात्मन:॥ १५॥ | | | | | | अनुवाद | | जब यज्ञ करनेवाला मनुष्य, यज्ञ और सोमरस- ये तीनों न्यायपूर्वक पूर्ण होते हैं, तब यज्ञ ठीक से संपन्न होता है। अन्यायी मनुष्य न तो दूसरों का भला कर सकता है, न अपना ही। 15॥ | | | | When the person performing the Yagya, the Yagya and the Somaras – these three are fulfilled with justice then the Yagya is performed properly. An unjust man can neither do good to others nor to himself. 15॥ | | ✨ ai-generated | | |
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