श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 78: आपत्तिकालमें ब्राह्मणके लिये वैश्यवृत्तिसे निर्वाह करनेकी छूट तथा लुटेरोंसे अपनी और दूसरोंकी रक्षा करनेके लिये सभी जातियोंको शस्त्र धारण करनेका अधिकार एवं रक्षकको सम्मानका पात्र स्वीकार करना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  12.78.30 
तेभ्यो नमश्च भद्रं च ये शरीराणि जुह्वते।
ब्रह्मद्विषो नियच्छन्तस्तेषां नोऽस्तु सलोकता।
ब्रह्मलोकजित: स्वर्ग्यान् वीरांस्तान् मनुरब्रवीत्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
उन वीर आत्माओं को नमस्कार है जो ब्राह्मणों से द्वेष रखने वाले दुष्टों का दमन करने के लिए युद्ध की ज्वाला में अपने शरीर का बलिदान कर देते हैं। वे उन्नति करें। हमें भी उनके समान लोक की प्राप्ति हो। मनुजी ने कहा है कि 'वे स्वर्गीय वीर ब्रह्मलोक को जीत लेते हैं।'
 
Salutations to those brave souls who sacrifice their bodies in the flames of war to suppress the evil-doers who hate the Brahmins. May they prosper. May we attain a world similar to theirs. Manuji has said that 'those heavenly brave souls conquer the Brahmaloka'.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)