श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 78: आपत्तिकालमें ब्राह्मणके लिये वैश्यवृत्तिसे निर्वाह करनेकी छूट तथा लुटेरोंसे अपनी और दूसरोंकी रक्षा करनेके लिये सभी जातियोंको शस्त्र धारण करनेका अधिकार एवं रक्षकको सम्मानका पात्र स्वीकार करना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.78.22 
अद्भॺोऽग्निर्ब्रह्मत: क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम्।
तेषां सर्वत्रगं तेज: स्वासु योनिषु शाम्यति॥ २२॥
 
 
अनुवाद
अग्नि जल से, क्षत्रिय ब्राह्मण से और लोहा पत्थर से उत्पन्न होता है। इनकी शक्ति या प्रभाव सर्वत्र कार्य करता है; किन्तु जब वह अपनी उत्पत्ति के मूल कारणों के संपर्क में आता है, तो शान्त हो जाता है ॥22॥
 
Fire is born from water, Kshatriya from Brahmin and iron from stone. Their power or influence works everywhere; but when it comes in contact with the root causes of its origin, it calms down. ॥22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)