श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 78: आपत्तिकालमें ब्राह्मणके लिये वैश्यवृत्तिसे निर्वाह करनेकी छूट तथा लुटेरोंसे अपनी और दूसरोंकी रक्षा करनेके लिये सभी जातियोंको शस्त्र धारण करनेका अधिकार एवं रक्षकको सम्मानका पात्र स्वीकार करना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.78.2 
भीष्म उवाच
अशक्त: क्षत्रधर्मेण वैश्यधर्मेण वर्तयेत्।
कृषिगोरक्ष्यमास्थाय व्यसने वृत्तिसंक्षये॥ २॥
 
 
अनुवाद
भीष्म बोले, 'हे राजन! यदि कोई ब्राह्मण संकट के समय, जब उसकी आजीविका नष्ट हो जाए, क्षत्रिय धर्म का पालन करके अपना निर्वाह करने में असमर्थ हो, तो उसे वैश्य धर्म के अनुसार कृषि और गोरक्षा का सहारा लेकर अपनी जीविका चलानी चाहिए।
 
Bhishma said, 'O King! If a Brahmin is unable to sustain himself by following the Kshatriya Dharma in a time of crisis when his livelihood is lost, then he should earn his livelihood by taking recourse to farming and cow protection according to the Vaishya Dharma.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)