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mahabharat 12.77.d1: यद्यपि मैं राज्य के सिंहासन पर बैठा हूँ, तथापि मैंने राज्य के समस्त कार्य अपने कर्तव्य पालन की दृष्टि से ही किए हैं और मैं कभी सत्य से विचलित नहीं हुआ; फिर आपने मेरे शरीर में प्रवेश कैसे किया?   |   mahabharat अध्याय 12.77: केकयराज तथा राक्षसका उपाख्यान और केकयराज्यकी श्रेष्ठताका विस्तृत वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 77: केकयराज तथा राक्षसका उपाख्यान और केकयराज्यकी श्रेष्ठताका विस्तृत वर्णन  »  श्लोक d1
 
 
श्लोक  12.77.d1 
(कृतं राज्यं मया सर्वं राज्यस्थेनापि कार्यवत्।
नाहं व्युत्क्रामित: सत्यान्मामकान्तरमाविश:॥ )
 
 
अनुवाद
यद्यपि मैं राज्य के सिंहासन पर बैठा हूँ, तथापि मैंने राज्य के समस्त कार्य अपने कर्तव्य पालन की दृष्टि से ही किए हैं और मैं कभी सत्य से विचलित नहीं हुआ; फिर आपने मेरे शरीर में प्रवेश कैसे किया?
 
Even though I am seated on the throne of the kingdom, I have carried out all the affairs of the kingdom with a view to fulfilling my duty and I have never deviated from the truth; then how did you enter my body?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)