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mahabharat 12.77.5: यदि ब्राह्मण में उपर्युक्त दोष हो तो राजा अपने को अपमानित समझता है; इसीलिए सभी राजाओं ने सदैव ब्राह्मणों की रक्षा की है ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.77: केकयराज तथा राक्षसका उपाख्यान और केकयराज्यकी श्रेष्ठताका विस्तृत वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 77: केकयराज तथा राक्षसका उपाख्यान और केकयराज्यकी श्रेष्ठताका विस्तृत वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.77.5 
अभिशस्तमिवात्मानं मन्यन्ते येन कर्मणा।
तस्माद् राजर्षय: सर्वे ब्राह्मणानन्वपालयन्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
यदि ब्राह्मण में उपर्युक्त दोष हो तो राजा अपने को अपमानित समझता है; इसीलिए सभी राजाओं ने सदैव ब्राह्मणों की रक्षा की है ॥5॥
 
If a Brahmin has the above mentioned fault, the king considers himself disgraced; that is why all the kings have always protected the Brahmins. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)