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एवं यो वर्तते राजा पौरजानपदेष्विह।
अनुभूयेह भद्राणि प्राप्नोतीन्द्रसलोकताम्॥ ३४॥
अनुवाद
जो राजा अपने नगर और राष्ट्र के नागरिकों के साथ धर्मपूर्वक व्यवहार करता है, वह इस लोक में सुख भोगकर अन्त में इन्द्रलोक को प्राप्त होता है ॥ 34॥
A king who behaves righteously with the citizens of his city and nation, after enjoying happiness in this world, ultimately attains Indraloka. ॥ 34॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कैकेयोपाख्याने सप्तसप्ततितमोऽध्याय:॥ ७७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें केकयराजका उपाख्यानविषयक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७७॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥