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mahabharat 12.77.3: राजा को चाहिए कि वह वर्ण के विरुद्ध कर्म करने वाले ब्राह्मणों की उपेक्षा न करे (क्योंकि उन्हें दण्ड देकर भी सही मार्ग पर लाना राजा का कर्तव्य है)। पुण्यात्मा पुरुष इसे राजाओं का आचरण या धर्म कहते हैं, जिसका पालन प्राचीन काल से होता आया है॥3॥   |   mahabharat अध्याय 12.77: केकयराज तथा राक्षसका उपाख्यान और केकयराज्यकी श्रेष्ठताका विस्तृत वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 77: केकयराज तथा राक्षसका उपाख्यान और केकयराज्यकी श्रेष्ठताका विस्तृत वर्णन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.77.3 
विकर्मस्थाश्च नोपेक्ष्या विप्रा राज्ञा कथञ्चन।
इति राज्ञां पुरावृत्तमभिजल्पन्ति साधव:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
राजा को चाहिए कि वह वर्ण के विरुद्ध कर्म करने वाले ब्राह्मणों की उपेक्षा न करे (क्योंकि उन्हें दण्ड देकर भी सही मार्ग पर लाना राजा का कर्तव्य है)। पुण्यात्मा पुरुष इसे राजाओं का आचरण या धर्म कहते हैं, जिसका पालन प्राचीन काल से होता आया है॥3॥
 
The king should not ignore the Brahmins who are engaged in activities contrary to their Varna (because it is the king's duty to bring them on the right track even by punishing them). The virtuous men call this the behaviour or Dharma of the kings which has been followed since ancient times.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)