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mahabharat 12.77.19: मैं अपने सुविख्यात कुल-धर्म, देश-धर्म और जाति-धर्म की परम्पराओं का पालन करता हूँ और इनमें से किसी भी धर्म को नष्ट नहीं होने देता, फिर आप मेरे अन्दर कैसे प्रविष्ट हुए?॥19॥   |   mahabharat अध्याय 12.77: केकयराज तथा राक्षसका उपाख्यान और केकयराज्यकी श्रेष्ठताका विस्तृत वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 77: केकयराज तथा राक्षसका उपाख्यान और केकयराज्यकी श्रेष्ठताका विस्तृत वर्णन  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  12.77.19 
कुलदेशादिधर्माणां प्रथितानां यथाविधि।
अव्युच्छेत्तास्मि सर्वेषां मामकान्तरमाविश:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
मैं अपने सुविख्यात कुल-धर्म, देश-धर्म और जाति-धर्म की परम्पराओं का पालन करता हूँ और इनमें से किसी भी धर्म को नष्ट नहीं होने देता, फिर आप मेरे अन्दर कैसे प्रविष्ट हुए?॥19॥
 
I follow the traditions of my renowned family-dharma, country-dharma and caste-dharma and do not allow any of these dharmas to be lost, then how did you enter inside me?॥19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)