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mahabharat 12.75.32: इससे बढ़कर राजा के लिए धर्म का और क्या काम हो सकता है कि ऐसे श्रेष्ठ और विद्वान पुरुष, जो जीविका के साधन न होने के कारण भय से व्याकुल रहते हैं, उनकी शरण लें और सुखपूर्वक सम्मानपूर्वक जीवनयापन करें ॥ 32॥   |   mahabharat अध्याय 12.75: राजाके कर्तव्यका वर्णन, युधिष्ठिरका राज्यसे विरक्त होना एवं भीष्मजीका पुन: राज्यकी महिमा सुनाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 75: राजाके कर्तव्यका वर्णन, युधिष्ठिरका राज्यसे विरक्त होना एवं भीष्मजीका पुन: राज्यकी महिमा सुनाना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  12.75.32 
यं हि वैद्या: कुले जाता ह्यवृत्तिभयपीडिता:।
प्राप्य तृप्ता: प्रतिष्ठन्ति धर्म: कोऽभ्यधिकस्तत:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
इससे बढ़कर राजा के लिए धर्म का और क्या काम हो सकता है कि ऐसे श्रेष्ठ और विद्वान पुरुष, जो जीविका के साधन न होने के कारण भय से व्याकुल रहते हैं, उनकी शरण लें और सुखपूर्वक सम्मानपूर्वक जीवनयापन करें ॥ 32॥
 
What can be a better act of Dharma for a king than this, when such noble and learned men, who are afflicted with fear due to having no means of livelihood, take shelter in him and live contentedly with dignity? ॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)