श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 75: राजाके कर्तव्यका वर्णन, युधिष्ठिरका राज्यसे विरक्त होना एवं भीष्मजीका पुन: राज्यकी महिमा सुनाना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.75.28 
नैकान्तविनिपातेन विचचारेह कश्चन।
धर्मी गृही वा राजा वा ब्रह्मचारी यथा पुन:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
चाहे कोई धार्मिक हो, गृहस्थ हो, ब्रह्मचारी हो या राजा हो, वह धर्म का पूर्णतः पालन नहीं कर सकता (उसमें सदैव कुछ न कुछ अधर्म का मिश्रण रहता ही है)।॥28॥
 
Whether one is a religious person, a householder, a celibate or a king, he cannot follow Dharma completely (there is always some mixture of Adharma or other).॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)