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mahabharat 12.75.10: मैं तुम्हें वह उपाय बताता हूँ जिससे राजा ऐसे पापों से मुक्त हो सकता है। सुनो। यदि चोर या डाकू किसी का धन चुरा ले जाएँ और राजा उसे ढूँढ़कर लौटाने में असमर्थ हो, तो असहाय राजा को चाहिए कि वह अपने संरक्षण में रहने वाले व्यक्ति को राजकोष से उतना ही धन दे दे।   |   mahabharat अध्याय 12.75: राजाके कर्तव्यका वर्णन, युधिष्ठिरका राज्यसे विरक्त होना एवं भीष्मजीका पुन: राज्यकी महिमा सुनाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 75: राजाके कर्तव्यका वर्णन, युधिष्ठिरका राज्यसे विरक्त होना एवं भीष्मजीका पुन: राज्यकी महिमा सुनाना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  12.75.10 
तादृशात् किल्बिषाद् राजा शृणु येन प्रमुच्यते।
प्रत्याहर्तुमशक्यं स्याद् धनं चोरैर्हृतं यदि।
तत् स्वकोशात् प्रदेयं स्यादशक्तेनोपजीवत:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
मैं तुम्हें वह उपाय बताता हूँ जिससे राजा ऐसे पापों से मुक्त हो सकता है। सुनो। यदि चोर या डाकू किसी का धन चुरा ले जाएँ और राजा उसे ढूँढ़कर लौटाने में असमर्थ हो, तो असहाय राजा को चाहिए कि वह अपने संरक्षण में रहने वाले व्यक्ति को राजकोष से उतना ही धन दे दे।
 
I will tell you the means by which a king can be freed from such sins. Listen. If thieves or robbers have stolen someone's wealth and the king is unable to trace it and return it, then the helpless king should give the same amount of money from the royal treasury to the person living under his protection.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)