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mahabharat 12.73.3-4: यदि राजा और पुरोहित धर्मपरायण, आदरणीय और तपस्वी हों, आपस में मधुर सम्बन्ध रखते हों और समान हृदय के हों, तो वे मिलकर प्रजा की वृद्धि करते हैं और समस्त देवताओं और पितरों को संतुष्ट करके पुत्रों और प्रजा को भी समृद्ध बनाते हैं। ऐसे ब्राह्मण (पुरोहित) और क्षत्रिय (राजा) का आदर करने से प्रजा सुख प्राप्त करती है। ॥3-4॥   |   mahabharat अध्याय 12.73: विद्वान् सदाचारी पुरोहितकी आवश्यकता तथा ब्राह्मण और क्षत्रियमें मेल रहनेसे लाभविषयक राजा पुरूरवाका उपाख्यान   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 73: विद्वान् सदाचारी पुरोहितकी आवश्यकता तथा ब्राह्मण और क्षत्रियमें मेल रहनेसे लाभविषयक राजा पुरूरवाका उपाख्यान  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  12.73.3-4 
उभौ प्रजा वर्धयतो देवान् सर्वान् सुतान् पितॄन्।
भवेयातां स्थितौ धर्मे श्रद्धेयौ सुतपस्विनौ॥ ३॥
परस्परस्य सुहृदौ विहितौ समचेतसौ।
ब्रह्मक्षत्रस्य सम्मानात् प्रजा सुखमवाप्नुयात्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
यदि राजा और पुरोहित धर्मपरायण, आदरणीय और तपस्वी हों, आपस में मधुर सम्बन्ध रखते हों और समान हृदय के हों, तो वे मिलकर प्रजा की वृद्धि करते हैं और समस्त देवताओं और पितरों को संतुष्ट करके पुत्रों और प्रजा को भी समृद्ध बनाते हैं। ऐसे ब्राह्मण (पुरोहित) और क्षत्रिय (राजा) का आदर करने से प्रजा सुख प्राप्त करती है। ॥3-4॥
 
If the king and the priest are pious, respectable and ascetic, have cordial relations with each other and are of similar heart, then together they increase the population and by satisfying all the gods and forefathers, they also make the sons and the subjects prosper. By respecting such a Brahmin (priest) and Kshatriya (king), the subjects attain happiness. ॥ 3-4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)