श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 73: विद्वान् सदाचारी पुरोहितकी आवश्यकता तथा ब्राह्मण और क्षत्रियमें मेल रहनेसे लाभविषयक राजा पुरूरवाका उपाख्यान  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.73.27 
पापस्य लोको निरयोऽप्रकाशो
नित्यं दु:खं शोकभूयिष्ठमेव।
तत्रात्मानं शोचति पापकर्म
बह्वी: समा: प्रतपन्नप्रतिष्ठ:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
पापियों का लोक नरक है, जहाँ हर समय अन्धकार छाया रहता है। वहाँ प्रतिदिन दुःख बढ़ता ही रहता है। पापी वहाँ अनेक वर्षों तक दुःख भोगता है, कभी एक स्थान पर स्थिर नहीं रहता और हर समय अपने लिए शोक करता रहता है॥ 27॥
 
The world of sinners is hell, where darkness prevails all the time. There is pain and more and more sorrow every day. The sinner suffers there for many years, never remains stable at one place and keeps grieving for himself all the time.॥ 27॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas