श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 73: विद्वान् सदाचारी पुरोहितकी आवश्यकता तथा ब्राह्मण और क्षत्रियमें मेल रहनेसे लाभविषयक राजा पुरूरवाका उपाख्यान  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  12.73.26 
पुण्यस्य लोको मधुमान् घृतार्चि-
र्हिरण्यज्योतिरमृतस्य नाभि:।
तत्र प्रेत्य मोदते ब्रह्मचारी
न तत्र मृत्युर्न जरा नोत दु:खम्॥ २६॥
 
 
अनुवाद
पुण्यात्मा का लोक मधुरतम सुखों से परिपूर्ण है। वहाँ घी के दीपक जलते हैं। उसमें स्वर्ण के समान प्रकाश फैलता है। वहाँ अमृत ही केन्द्र है। उस लोक में न मृत्यु है, न वृद्धावस्था, न ही अन्य कोई दुःख। मृत्यु के पश्चात् ब्रह्मचारी पुरुष उसी स्वर्गलोक में जाकर सुख भोगता है॥ 26॥
 
The world of a virtuous soul is full of the sweetest pleasures. Ghee lamps burn there. Light like gold spreads in it. Amrit is the center there. There is neither death nor old age nor any other sorrow in that world. After death, a celibate man experiences happiness by going to the same heavenly world.॥ 26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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