श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 73: विद्वान् सदाचारी पुरोहितकी आवश्यकता तथा ब्राह्मण और क्षत्रियमें मेल रहनेसे लाभविषयक राजा पुरूरवाका उपाख्यान  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.73.25 
कश्यप उवाच
एवमस्मिन् वर्तते लोक एव
नामुत्रैवं वर्तते राजपुत्र।
प्रेत्यैतयोरन्तरावान् विशेषो
यो वै पुण्यं चरते यश्च पापम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
कश्यप बोले- राजकुमार! ऐसी बातें तो इसी लोक में देखने को मिलती हैं, परलोक में ऐसा आचरण देखने को नहीं मिलता। अच्छे कर्म करने वाला और बुरे कर्म करने वाला - दोनों ही जब मृत्यु के बाद परलोक जाते हैं, तो वहाँ उनकी स्थिति में बहुत बड़ा अंतर आ जाता है।
 
Kashyap said- Prince! Such things are seen only in this world, this kind of behaviour is not seen in the other world. The one who does good deeds and the one who does bad deeds - when both go to the other world after death, there is a huge difference in their condition there.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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