श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 73: विद्वान् सदाचारी पुरोहितकी आवश्यकता तथा ब्राह्मण और क्षत्रियमें मेल रहनेसे लाभविषयक राजा पुरूरवाका उपाख्यान  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.73.23 
कश्यप उवाच
असंत्यागात् पापकृतामपापां-
स्तुल्यो दण्ड: स्पृशते मिश्रभावात्।
शुष्केणार्द्रं दह्यते मिश्रभावा-
न्न मिश्र: स्यात् पापकृद्भि: कथंचित्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
कश्यप बोले- पापियों का संग न छोड़ने से पुण्यात्मा और पापरहित पुरुषों को भी उनके समान ही दण्ड भोगना पड़ता है। जैसे गीली लकड़ी सूखी लकड़ी के साथ मिलकर जल जाती है। अतः विवेकशील पुरुष को पापियों के साथ किसी भी प्रकार का सम्पर्क नहीं करना चाहिए॥23॥
 
Kashyap said- By not giving up the company of sinners, even the virtuous and sinless men have to suffer the same punishment as them for associating with them. Just like wet wood burns when it is mixed with dry wood. Therefore, a prudent man should not establish any kind of contact with sinners.॥23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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