श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 73: विद्वान् सदाचारी पुरोहितकी आवश्यकता तथा ब्राह्मण और क्षत्रियमें मेल रहनेसे लाभविषयक राजा पुरूरवाका उपाख्यान  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.73.21 
कश्यप उवाच
यथैकगेहे जातवेदा: प्रदीप्त:
कृत्स्नं ग्रामं दहते चत्वरं वा।
विमोहनं कुरुते देव एष
तत: सर्वं स्पृश्यते पुण्यपापै:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
कश्यप बोले - "जैसे घर में अग्नि प्रज्वलित होकर आँगन तथा सम्पूर्ण गाँव को जला डालती है, वैसे ही ये रुद्रदेव भी किसी प्राणी के भीतर विशेष रूप से प्रकट होकर दूसरों के मन में भी मोह उत्पन्न करते हैं; तब सम्पूर्ण जगत् पुण्य और पाप से युक्त हो जाता है॥ 21॥
 
Kasyapa said, "Just as a fire ignites in a house and burns down the courtyard and the entire village, similarly, this Rudradev, manifesting in a particular form within a creature, creates delusion in the minds of others as well; then the entire world becomes associated with virtue and sin.॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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