श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 73: विद्वान् सदाचारी पुरोहितकी आवश्यकता तथा ब्राह्मण और क्षत्रियमें मेल रहनेसे लाभविषयक राजा पुरूरवाका उपाख्यान  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.73.18 
ऐल उवाच
कुतो रुद्र: कीदृशो वापि रुद्र:
सत्त्वै: सत्त्वं दृश्यते वध्यमानम्।
एतत् सर्वं कश्यप मे प्रचक्ष्व
कुतो रुद्रो जायते देव एष:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
पुरुरवा ने पूछा - कश्यप जी ! ये रुद्रदेव कहाँ से आते हैं और कैसे हैं ? इस संसार में हम प्राणियों द्वारा प्राणियों का वध होते देखते हैं; फिर ये रुद्रदेव कहाँ से उत्पन्न होते हैं ? ये सब बातें मुझे बताइए ॥18॥
 
Pururava asked - Kashyap ji! Where does this Rudradev come from and how is he? In this world we see creatures being killed by creatures; then from where does this Rudradev originate? Tell me all these things.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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