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mahabharat 12.73.15: जहाँ ब्रह्मचारी ब्राह्मण लुटेरों द्वारा वेदों का अध्ययन करने के लिए विवश किया जाता है और शरण माँगता है, वहाँ यदि इन्द्रदेव वर्षा करते हैं (वहाँ प्रायः वर्षा नहीं होती) और महामारी, दुर्भिक्ष आदि असह्य संकट आते हैं, तो यह आश्चर्य की बात है॥15॥   |   mahabharat अध्याय 12.73: विद्वान् सदाचारी पुरोहितकी आवश्यकता तथा ब्राह्मण और क्षत्रियमें मेल रहनेसे लाभविषयक राजा पुरूरवाका उपाख्यान   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 73: विद्वान् सदाचारी पुरोहितकी आवश्यकता तथा ब्राह्मण और क्षत्रियमें मेल रहनेसे लाभविषयक राजा पुरूरवाका उपाख्यान  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.73.15 
न ब्रह्मचारी चरणादपेतो
यदा ब्रह्म ब्रह्मणि त्राणमिच्छेत्।
आश्चर्यतो वर्षति तत्र देव-
स्तत्राभीक्ष्णं दु:सहाश्चाविशन्ति॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जहाँ ब्रह्मचारी ब्राह्मण लुटेरों द्वारा वेदों का अध्ययन करने के लिए विवश किया जाता है और शरण माँगता है, वहाँ यदि इन्द्रदेव वर्षा करते हैं (वहाँ प्रायः वर्षा नहीं होती) और महामारी, दुर्भिक्ष आदि असह्य संकट आते हैं, तो यह आश्चर्य की बात है॥15॥
 
Where a celibate Brahmin is forced by robbers to study the Vedas and seeks protection, it is a matter of wonder if the god Indra rains there (it usually does not rain there), and epidemics and famines, etc., arrive in such unbearable troubles.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)