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श्लोक 12.73.14  |
ब्रह्मवृक्षो रक्ष्यमाणो मधु हेम च वर्षति।
अरक्ष्यमाण: सततमश्रु पापं च वर्षति॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| यदि ब्राह्मणरूपी वृक्ष की रक्षा की जाए, तो वह मधुर सुख और स्वर्ण की वर्षा करता है। यदि उसकी रक्षा न की जाए, तो वह निरंतर दुःख और पाप के आँसू बरसाता है ॥14॥ |
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| If the tree of Brahmin is protected, it showers sweet pleasure and gold. If it is not protected, it continuously showers tears of sorrow and sin. ॥14॥ |
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