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mahabharat 12.73.14: यदि ब्राह्मणरूपी वृक्ष की रक्षा की जाए, तो वह मधुर सुख और स्वर्ण की वर्षा करता है। यदि उसकी रक्षा न की जाए, तो वह निरंतर दुःख और पाप के आँसू बरसाता है ॥14॥   |   mahabharat अध्याय 12.73: विद्वान् सदाचारी पुरोहितकी आवश्यकता तथा ब्राह्मण और क्षत्रियमें मेल रहनेसे लाभविषयक राजा पुरूरवाका उपाख्यान   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 73: विद्वान् सदाचारी पुरोहितकी आवश्यकता तथा ब्राह्मण और क्षत्रियमें मेल रहनेसे लाभविषयक राजा पुरूरवाका उपाख्यान  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.73.14 
ब्रह्मवृक्षो रक्ष्यमाणो मधु हेम च वर्षति।
अरक्ष्यमाण: सततमश्रु पापं च वर्षति॥ १४॥
 
 
अनुवाद
यदि ब्राह्मणरूपी वृक्ष की रक्षा की जाए, तो वह मधुर सुख और स्वर्ण की वर्षा करता है। यदि उसकी रक्षा न की जाए, तो वह निरंतर दुःख और पाप के आँसू बरसाता है ॥14॥
 
If the tree of Brahmin is protected, it showers sweet pleasure and gold. If it is not protected, it continuously showers tears of sorrow and sin. ॥14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)