श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 73: विद्वान् सदाचारी पुरोहितकी आवश्यकता तथा ब्राह्मण और क्षत्रियमें मेल रहनेसे लाभविषयक राजा पुरूरवाका उपाख्यान  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.73.13 
नात्र पारं लभते पारगामी
महागाधे नौरिव सम्प्रपन्ना।
चातुर्वर्ण्यं भवति हि सम्प्रमूढं
प्रजास्तत: क्षयसंस्था भवन्ति॥ १३॥
 
 
अनुवाद
जैसे विशाल और गहरे समुद्र में टूटी हुई नाव दूसरे किनारे तक नहीं पहुँच पाती, वैसे ही उस स्थिति में मनुष्य भी अपनी जीवन यात्रा सफलतापूर्वक पूरी नहीं कर पाते। चारों वर्णों के लोग मोह में लीन हो जाते हैं और उनका विनाश होने लगता है॥13॥
 
Just as a boat broken in a vast and deep sea cannot reach the other shore, similarly in that condition human beings are not able to complete their journey of life successfully. The people of all the four castes get engulfed in delusion and they start getting destroyed.॥13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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