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mahabharat 12.71.7: जो मूर्ख राजा काम और क्रोध का आश्रय लेकर धन कमाने की इच्छा रखता है, उसे न तो धर्म की प्राप्ति होती है और न ही धन की। ॥7॥   |   mahabharat अध्याय 12.71: धर्मपूर्वक प्रजाका पालन ही राजाका महान् धर्म है, इसका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 71: धर्मपूर्वक प्रजाका पालन ही राजाका महान् धर्म है, इसका प्रतिपादन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.71.7 
कामक्रोधौ पुरस्कृत्य योऽर्थं राजानुतिष्ठति।
न स धर्मं न चाप्यर्थं प्रतिगृह्णाति बालिश:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जो मूर्ख राजा काम और क्रोध का आश्रय लेकर धन कमाने की इच्छा रखता है, उसे न तो धर्म की प्राप्ति होती है और न ही धन की। ॥7॥
 
The foolish king who seeks to earn wealth by resorting to lust and anger neither attains Dharma nor wealth. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)