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mahabharat 12.71.14: शास्त्रविरुद्ध चलने वाला राजा न तो धर्म को प्राप्त कर सकता है और न ही अर्थ को। यदि उसे धन भी मिल जाए, तो वह सब पापकर्मों में नष्ट हो जाता है। ॥14॥   |   mahabharat अध्याय 12.71: धर्मपूर्वक प्रजाका पालन ही राजाका महान् धर्म है, इसका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 71: धर्मपूर्वक प्रजाका पालन ही राजाका महान् धर्म है, इसका प्रतिपादन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.71.14 
अपशास्त्रपरो राजा धर्मार्थान्नाधिगच्छति।
अस्थाने चास्य तद् वित्तं सर्वमेव विनश्यति॥ १४॥
 
 
अनुवाद
शास्त्रविरुद्ध चलने वाला राजा न तो धर्म को प्राप्त कर सकता है और न ही अर्थ को। यदि उसे धन भी मिल जाए, तो वह सब पापकर्मों में नष्ट हो जाता है। ॥14॥
 
A king who goes against the scriptures can neither achieve Dharma nor Artha. Even if he gets wealth, it is all wasted in evil deeds. ॥14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)