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mahabharat 12.71.12: जो राजा आलस्य त्यागकर, राग-द्वेष से रहित होकर, सदैव प्रजा की रक्षा करता है, दान देता है तथा सदैव धर्म और न्याय में तत्पर रहता है, वह समस्त प्रजा को प्रिय होता है ॥12॥   |   mahabharat अध्याय 12.71: धर्मपूर्वक प्रजाका पालन ही राजाका महान् धर्म है, इसका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 71: धर्मपूर्वक प्रजाका पालन ही राजाका महान् धर्म है, इसका प्रतिपादन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  12.71.12 
गोपायितारं दातारं धर्मनित्यमतन्द्रितम्।
अकामद्वेषसंयुक्तमनुरज्यन्ति मानवा:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
जो राजा आलस्य त्यागकर, राग-द्वेष से रहित होकर, सदैव प्रजा की रक्षा करता है, दान देता है तथा सदैव धर्म और न्याय में तत्पर रहता है, वह समस्त प्रजा को प्रिय होता है ॥12॥
 
The king who, having given up laziness and being free from love and hatred, always protects his subjects, gives charity and is always devoted to Dharma and justice, is loved by all the subjects. ॥12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)