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mahabharat 12.7.6: क्षमा, मन और इन्द्रियों का संयम, आन्तरिक और बाह्य पवित्रता, वैराग्य, ईर्ष्या का अभाव, अहिंसा और सत्य बोलना - ये वनवासियों के उत्तम दैनिक धर्म हैं ॥6॥   |   mahabharat अध्याय 12.7: युधिष्ठिरका अर्जुनसे आन्तरिक खेद प्रकट करते हुए अपने लिये राज्य छोड़कर वनमें चले जानेका प्रस्ताव करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 7: युधिष्ठिरका अर्जुनसे आन्तरिक खेद प्रकट करते हुए अपने लिये राज्य छोड़कर वनमें चले जानेका प्रस्ताव करना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.7.6 
साधु क्षमा दम: शौचं वैराग्यं चाप्यमत्सर:।
अहिंसा सत्यवचनं नित्यानि वनचारिणाम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
क्षमा, मन और इन्द्रियों का संयम, आन्तरिक और बाह्य पवित्रता, वैराग्य, ईर्ष्या का अभाव, अहिंसा और सत्य बोलना - ये वनवासियों के उत्तम दैनिक धर्म हैं ॥6॥
 
Forgiveness, control of mind and senses, inner and outer purity, dispassion, absence of jealousy, non-violence and speaking the truth – these are the best daily dharma of the forest dwellers. 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)