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mahabharat 12.7.5: क्षत्रियों के आचरण, बल, पराक्रम और क्रोध को धिक्कार है, जिनके कारण हम ऐसी विपत्ति में पड़ गए हैं ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.7: युधिष्ठिरका अर्जुनसे आन्तरिक खेद प्रकट करते हुए अपने लिये राज्य छोड़कर वनमें चले जानेका प्रस्ताव करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 7: युधिष्ठिरका अर्जुनसे आन्तरिक खेद प्रकट करते हुए अपने लिये राज्य छोड़कर वनमें चले जानेका प्रस्ताव करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.7.5 
धिगस्तु क्षात्रमाचारं धिगस्तु बलपौरुषम्।
धिगस्त्वमर्षं येनेमामापदं गमिता वयम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
क्षत्रियों के आचरण, बल, पराक्रम और क्रोध को धिक्कार है, जिनके कारण हम ऐसी विपत्ति में पड़ गए हैं ॥5॥
 
Shame on the behaviour, strength, valour and anger of the Kshatriyas, because of which we have fallen into such a calamity. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)