Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.7.40-41h: हे शत्रुओं का नाश करने वाले अर्जुन! मैं आप सबसे विदा लेकर वन में जा रहा हूँ। हे शत्रुघ्न! श्रुति कहती है कि परिग्रह में उलझा हुआ मनुष्य पूर्ण धर्म (परमात्मा का साक्षात्कार) को प्राप्त नहीं कर सकता। मैं इसका प्रत्यक्ष अनुभव कर रहा हूँ। | mahabharat अध्याय 12.7: युधिष्ठिरका अर्जुनसे आन्तरिक खेद प्रकट करते हुए अपने लिये राज्य छोड़कर वनमें चले जानेका प्रस्ताव करना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
वनमामन्त्र्य व: सर्वान् गमिष्यामि परंतप।
न हि कृत्स्नतमो धर्म: शक्य: प्राप्तुमिति श्रुति:॥ ४०॥
परिग्रहवता तन्मे प्रत्यक्षमरिसूदन।
अनुवाद
हे शत्रुओं का नाश करने वाले अर्जुन! मैं आप सबसे विदा लेकर वन में जा रहा हूँ। हे शत्रुघ्न! श्रुति कहती है कि परिग्रह में उलझा हुआ मनुष्य पूर्ण धर्म (परमात्मा का साक्षात्कार) को प्राप्त नहीं कर सकता। मैं इसका प्रत्यक्ष अनुभव कर रहा हूँ।
O Arjuna, the destroyer of enemies, I will take leave from all of you and go to the forest. O Shatrughan! The Shruti says that a man entangled in possessions cannot achieve the complete Dharma (realization of God). I am experiencing this directly. 40 1/2.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥