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mahabharat 12.7.37-38: संन्यास, तीर्थयात्रा, वेद-शास्त्रों का अध्ययन और जप करने से भी पाप नष्ट हो जाते हैं। श्रुतिकाओं का कथन है कि संन्यासी मनुष्य पाप नहीं कर सकता और वह जन्म-मरण के बंधन में भी नहीं रहता।   |   mahabharat अध्याय 12.7: युधिष्ठिरका अर्जुनसे आन्तरिक खेद प्रकट करते हुए अपने लिये राज्य छोड़कर वनमें चले जानेका प्रस्ताव करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 7: युधिष्ठिरका अर्जुनसे आन्तरिक खेद प्रकट करते हुए अपने लिये राज्य छोड़कर वनमें चले जानेका प्रस्ताव करना  »  श्लोक 37-38
 
 
श्लोक  12.7.37-38 
निवृत्त्या तीर्थगमनाच्छ्रुतिस्मृतिजपेन वा॥ ३७॥
त्यागवांश्च पुन: पापं नालंकर्तुमिति श्रुति:।
त्यागवाञ्जन्ममरणे नाप्नोतीति श्रुतिर्यदा॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
संन्यास, तीर्थयात्रा, वेद-शास्त्रों का अध्ययन और जप करने से भी पाप नष्ट हो जाते हैं। श्रुतिकाओं का कथन है कि संन्यासी मनुष्य पाप नहीं कर सकता और वह जन्म-मरण के बंधन में भी नहीं रहता।
 
Sins are also eradicated by being devoted to retirement, performing pilgrimages, studying and chanting the Vedas and scriptures. The Shrutikas say that a man who renounces cannot commit sins and he is also not bound by birth and death.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)