श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 7: युधिष्ठिरका अर्जुनसे आन्तरिक खेद प्रकट करते हुए अपने लिये राज्य छोड़कर वनमें चले जानेका प्रस्ताव करना  »  श्लोक 36-37h
 
 
श्लोक  12.7.36-37h 
धनंजय कृतं पापं कल्याणेनोपहन्यते॥ ३६॥
ख्यापनेनानुतापेन दानेन तपसापि वा।
 
 
अनुवाद
धनंजय! किये हुए पाप, कहने से, पुण्य करने से, पश्चाताप करने से, दान देने से तथा तप करने से भी नष्ट हो जाते हैं ॥36 1/2॥
 
Dhananjay! The sins committed can be destroyed by telling about them, by doing good deeds, by repenting, by giving charity and also by penance. ॥ 36 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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