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mahabharat 12.7.32: ऐसा प्रतीत होता है मानो हमने अपने ही दोष से तेज से प्रकाशित समस्त दिशाओं को आग लगा दी है और सदा के लिए नष्ट हो गए हैं ॥ 32॥   |   mahabharat अध्याय 12.7: युधिष्ठिरका अर्जुनसे आन्तरिक खेद प्रकट करते हुए अपने लिये राज्य छोड़कर वनमें चले जानेका प्रस्ताव करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 7: युधिष्ठिरका अर्जुनसे आन्तरिक खेद प्रकट करते हुए अपने लिये राज्य छोड़कर वनमें चले जानेका प्रस्ताव करना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  12.7.32 
आत्मनो हि वयं दोषाद् विनष्टा: शाश्वती: समा:।
प्रदहन्तो दिश: सर्वा भास्वरा इव तेजसा॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
ऐसा प्रतीत होता है मानो हमने अपने ही दोष से तेज से प्रकाशित समस्त दिशाओं को आग लगा दी है और सदा के लिए नष्ट हो गए हैं ॥ 32॥
 
It is as if we have set fire to all the directions illuminated by the radiance and got destroyed forever due to our own fault. ॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)