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mahabharat 12.7.25: वह अपने मन्त्रियों, मित्रों और वेद-शास्त्रों के ज्ञाता विद्वानों की बातें भी नहीं सुन सका। उसे बहुमूल्य रत्नों, पृथ्वी के राज्य और धन की आय का सुख भोगने का अवसर भी नहीं मिला॥ 25॥   |   mahabharat अध्याय 12.7: युधिष्ठिरका अर्जुनसे आन्तरिक खेद प्रकट करते हुए अपने लिये राज्य छोड़कर वनमें चले जानेका प्रस्ताव करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 7: युधिष्ठिरका अर्जुनसे आन्तरिक खेद प्रकट करते हुए अपने लिये राज्य छोड़कर वनमें चले जानेका प्रस्ताव करना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.7.25 
नामात्यसुहृदां वाक्यं न च श्रुतवतां श्रुतम्।
न रत्नानि परार्घ्यानि न भूर्न द्रविणागम:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
वह अपने मन्त्रियों, मित्रों और वेद-शास्त्रों के ज्ञाता विद्वानों की बातें भी नहीं सुन सका। उसे बहुमूल्य रत्नों, पृथ्वी के राज्य और धन की आय का सुख भोगने का अवसर भी नहीं मिला॥ 25॥
 
He could not even listen to the words of his ministers, friends and scholars who knew the Vedas and scriptures. He did not get the opportunity to enjoy the pleasures of precious gems, kingdoms on earth and the income of wealth.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)