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mahabharat 12.7.23: यद्यपि हमने कभी कोई पाप नहीं किया था, फिर भी राजा धृतराष्ट्र हमसे सदैव द्वेष रखते थे। उनका मन सदैव हमें धोखा देने के विचार में लगा रहता था। वे माया का आश्रय लेते थे और झूठी नम्रता या विनम्रता का दिखावा करते थे॥ 23॥   |   mahabharat अध्याय 12.7: युधिष्ठिरका अर्जुनसे आन्तरिक खेद प्रकट करते हुए अपने लिये राज्य छोड़कर वनमें चले जानेका प्रस्ताव करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 7: युधिष्ठिरका अर्जुनसे आन्तरिक खेद प्रकट करते हुए अपने लिये राज्य छोड़कर वनमें चले जानेका प्रस्ताव करना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.7.23 
सदैव निकृतिप्रज्ञो द्वेष्टा मायोपजीवन:।
मिथ्याविनीत: सततमस्मास्वनपकारिषु॥ २३॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि हमने कभी कोई पाप नहीं किया था, फिर भी राजा धृतराष्ट्र हमसे सदैव द्वेष रखते थे। उनका मन सदैव हमें धोखा देने के विचार में लगा रहता था। वे माया का आश्रय लेते थे और झूठी नम्रता या विनम्रता का दिखावा करते थे॥ 23॥
 
Even though we never did anything wrong, King Dhritarashtra always hated us. His mind was always thinking of deceiving us. He used to take refuge in illusion and used to falsely show humility or politeness.॥ 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)