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mahabharat 12.7.20: जो लोग कामना और क्षोभ से भरे हुए हैं तथा क्रोध और हर्ष में अपना संतुलन खो देते हैं, वे कभी भी कहीं भी विजय का किंचित मात्र भी फल नहीं भोग सकते ॥20॥   |   mahabharat अध्याय 12.7: युधिष्ठिरका अर्जुनसे आन्तरिक खेद प्रकट करते हुए अपने लिये राज्य छोड़कर वनमें चले जानेका प्रस्ताव करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 7: युधिष्ठिरका अर्जुनसे आन्तरिक खेद प्रकट करते हुए अपने लिये राज्य छोड़कर वनमें चले जानेका प्रस्ताव करना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.7.20 
संयुक्ता: काममन्युभ्यां क्रोधहर्षासमञ्जसा:।
न ते जयफलं किंचिद् भोक्तारो जातु कर्हिचित्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
जो लोग कामना और क्षोभ से भरे हुए हैं तथा क्रोध और हर्ष में अपना संतुलन खो देते हैं, वे कभी भी कहीं भी विजय का किंचित मात्र भी फल नहीं भोग सकते ॥20॥
 
Those who are filled with desire and irritation and lose their balance in anger and joy can never enjoy the slightest fruit of victory anywhere. ॥20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)