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mahabharat 12.68.45: जब वह सब अधर्मियों को कठोर दण्ड देकर वश में करके उन्हें सन्मार्ग पर लाता है और पुण्यात्माओं पर दया करता है, तब वह यमराज माना जाता है ॥ 45॥   |   mahabharat अध्याय 12.68: वसुमना और बृहस्पतिके संवादमें राजाके न होनेसे प्रजाकी हानि और होनेसे लाभका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.68.45 
यदा त्वधार्मिकान् सर्वांस्तीक्ष्णैर्दण्डैर्नियच्छति।
धार्मिकांश्चानुगृह्णाति भवत्यथ यमस्तदा॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
जब वह सब अधर्मियों को कठोर दण्ड देकर वश में करके उन्हें सन्मार्ग पर लाता है और पुण्यात्माओं पर दया करता है, तब वह यमराज माना जाता है ॥ 45॥
 
When he controls all the irreligious people by severe punishment and brings them to the right path and shows mercy to the virtuous, then he is considered as Yamaraja. ॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)