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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 68: वसुमना और बृहस्पतिके संवादमें राजाके न होनेसे प्रजाकी हानि और होनेसे लाभका वर्णन
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श्लोक 39
श्लोक
12.68.39
यस्तस्य पुरुष: पापं मनसाप्यनुचिन्तयेत्।
असंशयमिह क्लिष्ट: प्रेत्यापि नरकं व्रजेत्॥ ३९॥
अनुवाद
जो मनुष्य मन में भी राजा के अहित का विचार करता है, वह इस लोक में अवश्य दुःख भोगता है और मरने के बाद नरक में जाता है ॥39॥
A man who even in his mind thinks of harm to the king will surely suffer in this world and will go to hell after death. ॥ 39॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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