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mahabharat 12.67.5: मेरी यह इच्छा है कि मैं उन देशों में न रहूँ जहाँ राजा न हो। राजाविहीन राज्य में अग्निदेव अपनी हवि नहीं ले जाते ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.67: राष्ट्रकी रक्षा और उन्नतिके लिये राजाकी आवश्यकताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 67: राष्ट्रकी रक्षा और उन्नतिके लिये राजाकी आवश्यकताका प्रतिपादन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.67.5 
नाराजकेषु राष्ट्रेषु वस्तव्यमिति रोचये।
नाराजकेषु राष्ट्रेषु हव्यमग्निर्वहत्युत॥ ५॥
 
 
अनुवाद
मेरी यह इच्छा है कि मैं उन देशों में न रहूँ जहाँ राजा न हो। राजाविहीन राज्य में अग्निदेव अपनी हवि नहीं ले जाते ॥5॥
 
My preference is that I should not live in countries where there is no king. In a kingdom without a king, Agnidev does not carry the offerings made to him. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)