Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.67.39: राजा को अपने उपकार करने वालों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए और अपने भक्तों के प्रति गहरा स्नेह रखना चाहिए। उसे अपने उपभोग की वस्तुओं का उचित ढंग से विभाजन करके उनका उपयोग करना चाहिए। उसे अपनी इंद्रियों को वश में रखना चाहिए। उसे अपने देखने वालों पर भी दृष्टि रखनी चाहिए और स्वभाव से कोमल, मधुर और सरल होना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 12.67: राष्ट्रकी रक्षा और उन्नतिके लिये राजाकी आवश्यकताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 67: राष्ट्रकी रक्षा और उन्नतिके लिये राजाकी आवश्यकताका प्रतिपादन  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  12.67.39 
कृतज्ञो दृढभक्ति: स्यात् संविभागी जितेन्द्रिय:।
ईक्षित: प्रतिवीक्षेत मृदु वल्गु च सुष्ठु च॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
राजा को अपने उपकार करने वालों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए और अपने भक्तों के प्रति गहरा स्नेह रखना चाहिए। उसे अपने उपभोग की वस्तुओं का उचित ढंग से विभाजन करके उनका उपयोग करना चाहिए। उसे अपनी इंद्रियों को वश में रखना चाहिए। उसे अपने देखने वालों पर भी दृष्टि रखनी चाहिए और स्वभाव से कोमल, मधुर और सरल होना चाहिए।
 
The king should be grateful to those who do him favours and should have deep affection for his devotees. He should divide the things that he needs to consume in a proper manner and use them. He should keep his senses under control. He should also look at those who look at him and should be soft, sweet and simple by nature.
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि राष्ट्रे राजकरणावश्यकत्वकथने सप्तषष्टितमोऽध्याय:॥ ६७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें राष्ट्रके लिये राजाको नियुक्त करनेकी आवश्यकताका कथनविषयक सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६७॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)