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mahabharat 12.67.35: इस संसार में जो व्यक्ति अपने स्वजनों द्वारा आदर पाता है, उसका दूसरे भी आदर करते हैं और जो व्यक्ति अपने स्वजनों द्वारा तिरस्कृत होता है, उसका दूसरे भी अनादर करते हैं ॥ 35॥   |   mahabharat अध्याय 12.67: राष्ट्रकी रक्षा और उन्नतिके लिये राजाकी आवश्यकताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 67: राष्ट्रकी रक्षा और उन्नतिके लिये राजाकी आवश्यकताका प्रतिपादन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.67.35 
सत्कृतं स्वजनेनेह परोऽपि बहु मन्यते।
स्वजनेन त्ववज्ञातं परे परिभवन्त्युत॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में जो व्यक्ति अपने स्वजनों द्वारा आदर पाता है, उसका दूसरे भी आदर करते हैं और जो व्यक्ति अपने स्वजनों द्वारा तिरस्कृत होता है, उसका दूसरे भी अनादर करते हैं ॥ 35॥
 
In this world, a person who is respected by his own relatives is also respected by others, and a person who is despised by his own relatives is also disrespected by others. ॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)