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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 67: राष्ट्रकी रक्षा और उन्नतिके लिये राजाकी आवश्यकताका प्रतिपादन  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  12.67.29 
विजयाय हि निर्याहि प्रतपन् रश्मिवानिव।
मानं विधम शत्रूणां जयोऽस्तु तव सर्वदा॥ २९॥
 
 
अनुवाद
महाराज! आप अपनी किरणों से प्रज्वलित सूर्य की भाँति विजय के लिए प्रयाण करें। शत्रुओं का अभिमान नष्ट करें और सदैव विजयी रहें।
 
'Maharaj! You should travel for victory like the blazing Sun with rays. Destroy the pride of your enemies and may you always be victorious.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)