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mahabharat 12.67.22: मनु बोले, "हे प्रभु! मैं पाप कर्मों से बहुत डरता हूँ। शासन करना बड़ा कठिन कार्य है - विशेषकर उन लोगों पर शासन करना तो और भी कठिन है जो सदैव पाप कर्मों में लिप्त रहते हैं।"   |   mahabharat अध्याय 12.67: राष्ट्रकी रक्षा और उन्नतिके लिये राजाकी आवश्यकताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 67: राष्ट्रकी रक्षा और उन्नतिके लिये राजाकी आवश्यकताका प्रतिपादन  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.67.22 
मनुरुवाच
बिभेमि कर्मण: पापाद् राज्यं हि भृशदुस्तरम्।
विशेषतो मनुष्येषु मिथ्यावृत्तेषु नित्यदा॥ २२॥
 
 
अनुवाद
मनु बोले, "हे प्रभु! मैं पाप कर्मों से बहुत डरता हूँ। शासन करना बड़ा कठिन कार्य है - विशेषकर उन लोगों पर शासन करना तो और भी कठिन है जो सदैव पाप कर्मों में लिप्त रहते हैं।"
 
Manu said, "O Lord! I am very afraid of sinful acts. It is a very difficult task to rule - especially to rule over people who are always involved in wrongdoings is even more difficult." 22.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)